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गंगा तट और मैं

कल की शाम जब बैठा था अकेला गंगा के तट पर हिलोरें उठ रही थी दिल में आज अगर शांत थी तो गंगा की न थकने वाली धारा दिल बेचैन था आख़िर आज सदियों पुरानी याद जैसी कुछ याद आ रही थी मगर गंगा की अविरल धारा में बह जाती और मन सोचते रह जाता एक कहानी थी जो आगे बढ़ी थी मगर उसी रिश्ते की तरह जो दोस्ती से आगे बढ़कर आगे तो निकलती है लेकिन साथ ही, तोड़ देती है दम जल्द ही शायद कोई और मिल जाता है आज की शाम, जिंदगी में अंधेरे की शाम सी थी बहुत कुछ भूलकर, बहुत कुछ याद कर बह उठी तबसे देख-देख कर थकी आँखे बून्द पहले महीनों के प्यासी गालों को सींचकर बढ़े आगे फिर जा मिले गंगा की उस धारा में जो आज शांत थी यह बताने के लिए कि तेरी जिंदगी भी अब शांत हो सकती है एक अंधकार को लिपट कर तभी सहसा एक पंक्षी युगल गुज़रे बहुत खुश थे शायद प्रकृति भी मुझे  ईर्ष्या आग में झुलसाना चाहती थी निरंतर बहते आंखों के बीच जब मैं रुमाल निकाला, आँखे पोछि अब सबकुछ साफ था आँखों में पड़े धूल निकल चुके थे चेहरा था यार की परन्तु आख़िरी यार की इसे खोना न चाहता  बस इसीलिए मैं हूँ और वह वह है ना मैं हम ह...

बूढ़े बरगद बाबा

रविवार की सुबह, इसबार हमलोग के लिए किसी श्राप से कम न था । जब नींद खुली तब यह सुनने को मिला कि पता कितने पीढ़ियों की विरासत और गाँव का सबसे बुजुर्ग पीपल जिसे प्यार से सब बूढ़ा बरगद/ दादा कहते थे वह अपनी जगह पर नहीं था । न जाने कितने पक्षियों के और न जानें कितने लोगों के स्वप्न उजड़ गए, कितने लोगों का वसेरा उजड़ गया । उन चिड़ियों के चीख के कल्पना मात्र से कलेजा दहल जाता हैं लेकिन क्या उस कसाई को समझ न आया जिसने यह अत्याचार किया । अब इसे समय की गति का परिणाम कहे या सरकारी जिद का नतीजा कह पाना बहुत ही मुश्किल हैं, क्योंकि शायद अब बूढ़े बाबा की उम्र लड़ गई हो और उनकी मृत्यु इसी प्रकार निर्धारित हो, लेकिन बूढ़े बाबा की शाखाओं में तो अभी इतनी जान बाकी थी कि वह आने वाली पीढ़ियों को अपने गोद में खेलते देख कर प्रसन्नचित होकर अपनी छाया को दूना कर देते । जरूर यह सरकारी महकमे के जिद का कारण हैं, कि भले कुछ भी हो जाय सड़क एक इंच भी टेड़ी न होने पाय । याद आता है, आज से एक महीने पहले गाँव में एक पंचायत बैठी थी, जिसमें सबकी सहमति से एक बात तय हुआ कि हम सरकार से निवेदन करेंगे कि बूढ़े बाबा को छोड़ दिया जाय, और उसक...

क्यों छठ पर्व नहीं, महापर्व हैं ।

भारत पर्व त्योहारों का देश कहा गया है और प्रत्येक त्योहार कहीं न कहीं प्रकति से जुड़ी है, हमारे यहाँ प्रत्येक ऋतु के बाद ऋतु पर्व बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है । इन्हीं पर्वों में से एक है, छठ । लेकिन छठ पर्व को पर्व नहीं, महापर्व कहा गया है, यह एकलौता ऐसा त्योहार है जिसे महापर्व कहा जाता है । यह बात अलग है कि यह उत्तर भारत का ही पर्व माना जाता है, और विश्व के जिस भी कोने में उत्तर भारतीय रहते है, वहाँ छठ की धूम एक अलग स्तर पर होती है ।          किसी ने मुझसे पूछा कि छठ को पर्व क्यों नहीं कहते, इसे महापर्व कहने की क्या जरूरत पड़ी, या इसे महापर्व क्यों कहा जाता है ? मैंने उत्तर दिया, और वहीं आपसे साझा भी कर रहा हूँ, अगर आप सहमत होंगे तो अपने आशिर्वाद अवश्य देंगे ।       दीपावली के ठीक पाँच दिन बाद, छठे दिन यह त्योहार मनाया जाता है, जबकि इसकी शुरुआत तो दीपावली के तीन दिन बाद ही, कार्तिक माह के शुक्लपक्ष चतुर्थी तिथि से शुरू हो जाती है, और उस दिन व्रती उगते सूर्य की पूजा अर्चना कर के उनसे इस पर्व को सफल बनाने की मन्नत माँगते है, क्योंकि सूर्य को अ...

मैंने देखा है

मोहब्बत मुक़म्मल हुई उसी की जिसमें दूरियां दरम्यान थी मैंने तो अक्सर नज़दीकियों में इश्क़ को टूटते, बिखरते देखा है जिनके साथ खाई थी कसमें साथ उम्र भर निभानें की मैं हर वक़्त उस इंसान को गैरों तलब बदलते देखा है पिलाकर सहज रस जीवन का उसने फेंक दिया कचरे को मैं उस कचरे को भी उम्र भर पीने को तड़पते देखा है जब खुद के मद में मदहोश हसीना कोई तोड़ती हैं पत्थर दिल फिर उस पत्थर को भी जीवन तलक मोम सा पिघलते देखा है छोड़ देते हैं साथ जिसका ज़माने के सब लोग ज़माने से अलग उसे हर रोज निखरते देखा है पिघल कर बह रही है जो अब मोम की दरिया पत्थर थी, वह उसे मैंने किसी के ठोकर से बिखरते देखा है जब खुद के मैं से हम हुए थे हम होकर भी केवल हम बचें छीन लिया ज़माने ने मुझसे मुझको मैंने खुद को हर वक़्त छिटकते देखा है किसी की ठोकर से हम यूँ पहुँच गए बर्बादी के किनारे उसने कहा था, बर्बाद हो जाओगे इश्क़ में फिर बाद में उसे ही बात से मुकरते देखा है इश्क़ की इतनी इबादत किसी गैर के लिए कौन करता बन गया गैर सुनते हुए प्यार का गीत बिखेर कर मुझको उसे, लश्कर में मुस्कुराते देखा है ...

बदलता इश्क़

वक़्त बदलते ही चेहरे पर चढ़ा लेते हैं नक़ाब या परवरदिगार चेहरे के पीछे चेहरा बनाने लगा इश्क़ में रुसवाईयाँ कुछ इस क़दर बढ़ रही देख बदलता रंग इंसानों के गिरगिट लजाने लगा कहीं दूर बजते थे ढोल खुशियों के ज़माने में वहाँ शहनाइयाँ भी मातमी धुन बजाने लगा शोला सा धधक उठा हैं, मेरे जान के भीतर इंसान पीठ के पीछे,  मोहब्बत फ़रमाने लगा जिसे चाहो तुम जान से ज़्यादा, कद्र करते नहीं वो अब लगा कर गले से तुमको, खंज़र पीठ में धसाने लगा मिट जाने पर हसरतें सारी इस दुनिया से मोहब्बत की चाह में इंसा दर-दर भटकने लगा किसी के ख़्वाब को सजाना, थी एक चाह मेरी वह इंसा बदल गया, ख़्वाब दूसरा दिखाने लगा मुझे मारकर जमाने में, मुझमें जिंदा किया मारकर ठोकर ज़माने को, मैं भी इतराने लगा ख़ाक में मिल गई, वह कोशिशें सारी आख़िर जब इंसान बदल गया, तो रुतवा बदल गया

इश्क़ आजकल

नफ़रतों के इस दौर में, तुम इश्क़ की बात करते हो ! ओ मोहब्बत के पुजारी, तुम भी कमाल करते हो ! तुम गला कर देह अपनी, उस बेवफ़ा को क्यों याद करते हो ? तुम्हें छला गया हैं, अपनी बर्बादी को क्यों याद करते हो ? ओ मोहब्ब्त के पुजारी, तुम भी क्या बात करते हो ! सुनें हो क्या कभी, किसी फ़टे ढ़ोल की आवाज़ ? मिली हैं मंजिल क्या कभी उसे, जिसने करी नहीं आगाज़ ? तुम भी कितने बेवकूफ़ नज़र आते हो, पत्थर से रब से अपनी फरियाद करते हो ! ओ मोहब्बत के पुजारी, तुम भी क्या बात करते हो ! उलझ कर रह गई थी, तेरी कलम गोरी के बालों में, तेरे दिन व रात कट जाती , नैन गुलाम थे उसके गालों के । कैसे फूँक दी तुमने वो तराना, कृष्ण के मुरली में ? स्वयं की बर्बादी को तुम, आबाद कहते हो ! ओ मोहब्बत के पुजारी, तुम भी क्या बात करते हो ! तुम्हें पता नहीं, दुनिया कितना बदल गई है ? प्यार के मतलब को, धन निगल गई है । जब इश्क़ करना तो, अब थोड़ा सम्भल के , क्यों अपने हाथ से कुल्हाड़ी, अपने पैर पर करते हो ! ओ मोहब्बत के पुजारी, तुम भी क्या बात करते हो ! जला दिए घर अपने इश्क़ के राह में तो क्या, चाहते हो तेरी महबूबा भी जला ड...

टमाटर और बैंगन का इश्क़

यह कहानी जो सुनने में थोड़ी अटपटी तो लगेगी लेकिन अगर हम सिर्फ इसे एक कहानी के तौर पर पढ़े तो मज़ा आएगा ऐसा आशा करता हूँ । यह कहानी जीवन के दो सबसे खास दोस्त प्रगति मधुप और अंजली मिश्रा को समर्पित । यह कहानी है टमाटर और बैंगन की । जी हाँ, सब्जी टमाटर और बैंगन की । आज टमाटर दुःखी मन से मगर तेज कदमों से आगे बढ़ रही है, दुःखी इसलिए क्योंकि आज उसे अपना घर छोड़ कर पराये घर को जाना पड़ रहा है, जो कभी चाहा न था । अरे भैया बात हो रही है, विद्यालय छोड़ने की, आज पुराने विद्यालय को छोड़कर एक नए नवेले विद्यालय में जाना था जहाँ की संस्कृति कुछ मिलती तो बहुत जुदा-जुदा है । ठीक उसी प्रकार जैसे किसी लड़की को शादी के बाद अपना घर छोड़ पति के घर जाना पड़ता है और वहाँ उसके सभी पहचान को बदल दिया जाता है, और अब वह ससुराल से जानी जाती है, इस कारण टमाटर भी दुःखी है, लेकिन खुश इस वजह से कि आज उसके जीवन का बहुत अहम दिन है । टमाटर अपने दोस्त भिंडी और टिंडे के साथ थी परन्तु उसे क्या पता कि उसका पीछा इसी गली के दो लफंगे, यानी बैंगन और मूली कर रहे है, और सामान्य इंसानी छात्र की तरह लाल वाली तेरी, हरी वाली मेरी तय हो जाता है...